Showing posts with label Pramod Krishna Khurana. Show all posts
Showing posts with label Pramod Krishna Khurana. Show all posts

Sunday, May 15, 2011

PK Khurana and Alternative Journalism

आओ भारत को बनाएं ‘यंगिस्तान’!
                                                                                                     पी. के. खुराना

आदमी उम्र से नहीं, विचारों से बूढ़ा होता है। जब हम नये विचार ग्रहण करना बंद कर देते हैं तो हम बूढ़े हो जाते हैं। देश के समग्र विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम अन्य व्यक्तियों के दृष्टिकोण के प्रति दिमाग खुला रखें और उनसे लाभ लेने के लिए आवश्यक माहौल तैयार करें। युवाशक्ति की प्रशंसा इसीलिए की जाती है कि उनमें उर्जा तो बहुत होती है पर पूर्वाग्रह नहीं होता और वे दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति खुले दिमाग से सोचते हैं। अगर देश के सभी नागरिक हर मामले में युवा वर्ग के इसी दृष्टिकोण का अनुसरण करें तो हमारा देश ‘यंगिस्तान’बन जाएगा। ‘यंगिस्तान’का मतलब है खुला दिमाग, दूसरों के नज़रिये के प्रति सहनशीलता, नई बातें सीखने का जज्बा, काम से जी न चुराना, तकनीक का लाभ उठाने की योग्यता, प्रगति और रोज़गार के नए और ज्य़ादा अवसर, आपसी भाईचारा तथा देश और क्षेत्र का समग्र विकास !

भारतीय संविधान की मूल भावना है, ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार।’यानी हमारे संविधान निर्माता हर स्तर पर आम आदमी और सरकार और प्रशासन में उसकी भागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। भारतीय प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रणाली की संरचना इस प्रकार की गई थी कि यह एक लोक-कल्याणकारी राज्य बने जिसमें हर धर्म, वर्ग, जाति, लिंग और समाज के व्यक्ति को देश के विकास में भागीदारी के बराबर के अवसर मिलें। क्या यह संभव है कि देश के विकास में नागरिकों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करके देश में सच्चे प्रजातंत्र का माहौल बनाया जाए? अगर ऐसा हो सका तो यह देश में प्रजातंत्र की मजबूती की दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम सिद्ध होगा।

लोकतंत्र में तंत्र नहीं, बल्कि ‘लोक’की महत्ता होनी चाहिए। तंत्र का महत्व सिर्फ इतना-सा है कि काम सुचारू रूप से चले, व्यक्ति बदलने से नियम न बदलें, परंतु इसे दुरूह नहीं होना चाहिए और लोक पर हावी नहीं होने देना चाहिए। जब ऐसा होगा तभी हमारा लोकतंत्र सफल होगा, लेकिन ऐसा होने के लिए हमें अपने आप को बदलना होगा, हर नागरिक को अपने आप को बदलना होगा। यह काम कोई सरकार नहीं कर सकती, प्रशासन नहीं कर सकता, लोग कर सकते हैं। हमें याद रखना होगा कि सरकारें कभी क्रांति नहीं लातीं। क्रांति की शुरुआत सदैव जनता की ओर से हुई है। अब जनसामान्य और प्रबुद्धजनों को एकजुट होकर एक शांतिपूर्ण क्रांति की नींव रखने की आवश्यकता है। ई-गवर्नेंस, शिक्षा का प्रसार, अधिकारों के प्रति जागरूकता और भय और लालच पर नियंत्रण से हम निरंकुश अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को काबू में रख सकते हैं।

हमारे देश के सामने कई समस्याएं दरपेश हैं पर आम जनाता में उनको लेकर कुंठा तो रहती है, कोई सार्थक बहस नहीं होती, या फिर इतने छोटे स्तर पर बहस होती है कि उसका प्रशासन और सरकार पर असर नहीं होता, या फिर सिर्फ बहस ही होती रह जाती है।

जीवन में चार तरह की स्वतंत्रताएं महत्वपूर्ण हैं। एक -- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दो -- धर्म की स्वतंत्रता, तीन -- अभावों से छुटकारा और चार -- भय से आज़ादी। भारतवर्ष में हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। लेकिन हमारे देश में अभी अभावों से आज़ादी और भय से आज़ादी एक सपना है। अशिक्षा सेवा, सामान्य चिकित्सा सेवा का अभाव, पीने योग्य पानी की समस्या, सफाई का अभाव, रोज़गार की कमी, भूख और कुपोषण आदि समस्याएं, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि समस्याएं विकराल हैं और आम आदमी को इनसे राहत की कोई राह नज़र नहीं आती। पर क्या सचमुच इनका हल नहीं है? क्या सचमुच इसमें सारा दोष प्रशासन और सरकार का ही है? क्या हम सेमिनार और भाषण से आगे बढक़र कुछ और नहीं कर सकते? क्या हमारे पास इन समस्याओं से छुटकारा पाने का कोई भी साधन नहीं है?

गरीबी और बेरोज़गारी से छुटकारा संभव है, यदि गरीबी और बेरोज़गारी से छुटकारा मिल जाए तो शिक्षा, चिकित्सा, सफाई, पानी, कुपोषण, महंगाई आदि समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाती हैं। बहुत से लोग अज्ञान के कारण अथवा अपने निहित स्वार्थों की खातिर विकास के विरोध में खड़े नज़र आते हैं। कई एनजीओ और राजनीतिक नेता जानते-बूझते भी विरोध की राह पकड़ते हैं और आम आदमी उनके षड्यंत्र का शिकार हो जाता है।

अभी पिछले ही वर्ष हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष डा. विजय कुमार शर्मा, उनकी सहयोगी निशु शर्मा तथा कोटखाई के डीएवी कालेज के रोशन लाल वशिष्ठ ने एक अध्ययन में पाया कि राज्य के उन क्षेत्रों का तेजी से विकास हुआ है जहां औद्योगीकरण आया। प्रदेश के जिन हिस्सों में उद्योगों की स्थापना हुई वहां ढांचागत सुविधाएं, शिक्षा सुविधाएं, सडक़, बिजली, पानी की सुविधाएं, बैंकिंग व्यवस्था, आवासीय व्यवस्था तथा शॉपिंग सुविधाओं आदि में तेजी से विकास हुआ है। इन विद्वानों का मत है कि स्थानीय लोगों द्वारा राज्य में उद्योगों की स्थापना के किसी भी कदम का सदैव विरोध होता रहा है, अत: यह आवश्यक था कि औद्योगिक विकास के कारण होने वाले विकास के उदाहरणों को जनता के सम्मुख लाया जाए ताकि इस संबंध में पाली जा रही मिथ्या धारणाओं को तोड़ा जा सके।

डा. विजय कुमार शर्मा ने इन परिणामों पर टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘‘यह शोध कार्य इसलिए आरंभ किया गया था ताकि हम हिमाचल प्रदेश में औद्योगीकरण के प्रभावों का पता लगा सकें। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल प्रदेश पर्यावरण की दृष्टि से एक संवेदनशील राज्य है और लोगों की धारणा है कि विकास का हर प्रयास राज्य के समग्र संतुलन के लिए हानिकारक होगा। इसके विपरीत, हमारे अध्ययन से यह साबित हुआ है कि उद्योगों के विस्तार ने राज्य में विकास की गति तेज की है। उद्योगों की स्थापना का यह मतलब कतई नहीं है कि वे संतुलन के लिए हानिकारक ही होंगे। इसके विपरीत, उद्योगों के विकास से उन क्षेत्रों तथा स्थानीय लोगों के विकास की रफ्तार तेज हो सकती है।’’

दूसरी ओर ऐसी कंपनियों की भी कमी नहीं है जिन्होंने पर्यावरण की अनदेखी करते हुए आसपास के लोगों को उपहारस्वरूप कई तरह की बीमारियां दीं, उन्हें उनके मूल निवास से उजाड़ा और उनके पुनर्वास के लिए कुछ भी नहीं किया, या जो किया सिर्फ दिखावे के लिए किया। अत: औद्योगीकरण के लाभ पर लट्टू हुए बिना इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उद्योग से पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे, औद्योगीकरण के कारण विस्थापित लोगों के पुनर्वास और रोजग़ार का काम भी साथ-साथ चले, और विकास की राह में अनावश्यक रोड़े भी न अटकें। तभी गरीबी दूर होगी, अभावों से छुटकारा मिलेगा और शेष समस्याओं के हल की राह निकलेगी।   


मैं अपने ब्लॉग एचटीटीपी://माईइंडियाडॉटकॉम.ब्लॉगस्पॉट.कॉम पर भी आपसे रूबरू हूं ।


Youngistan, "Alternative Journalism", PK Khurana, Pramod Krishna Khurana, "Pioneering Alternative Journalism", Alternative Journalism in India, Pioneering Alternative Journalism in India, Change Agent, Poverty, Mindset of Poverty, Mentality of the Poor.

"Alternative Journalism and PK Khurana"

आतंकवाद का अर्थशास्त्र
                                                                                                                             l  पी. के. खुराना
भारतवर्ष के पूर्वोत्तर राज्यों में असम सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य है। असम अपने चाय बागानों, कामाख्या मंदिर के साथ-साथ शेष विश्व में आतंकवाद के लिए भी जाना जाता है। हाल ही में असम में चुनाव संपन्न हुए। चार अप्रैल और ग्यारह अप्रैल को दो चरणों में मतदान हुआ। मतदान का प्रतिशत बहुत अच्छा था, मतदान शांतिपूर्ण रहा और देश भर का मीडिया बता रहा है कि यह लोकतंत्र की जीत है। तेरह मई को चुनाव परिणाम आ जाएंगे और फिर कोई न कोई सरकार, संभवत: कांग्रेस की ही सरकार, असम का प्रशासन संभाल लेगी।

चुनाव की अवधि में मैं लगभग 25 दिन के असम प्रवास पर था और यहां कई वरिष्ठ पत्रकारों से मिलने का अवसर मिला। असम आने से पहले मैं आतंकवाद के अर्थशास्त्र को नहीं जानता था, पर यहां से प्रकाशित प्रसिद्ध हिंदी समाचारपत्र दैनिक सेंटिनल के संपादक श्री दिनकर कुमार जी से मुलाकात ने मेरी आंखें खोलीं और मेरे सामने आतंकवाद का एक नया पहलू सामने आया, जो मेरी कल्पनाशक्ति से बाहर था।

यह सही है कि हमारे कई पड़ोसी देश आतंकवाद को जिंदा रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन पूरा सच यह है कि भारतीय राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी आतंकवाद की रोकथाम नहीं चाहते हैं, आतंकवाद जारी रहने में उनका बहुत बड़ा स्वार्थ निहित है, और वह स्वार्थ है अरबों-खरबों की धनराशि जो यह सब लोग आपस में मिल बांट कर खाते हैं।

आतंक आज भी असम की एक सच्चाई है और आतंकवादियों की ओर से असम बंद का फरमान जारी हो तो पूरा बाजार बंद रहता है। उसमें कोई एक्सेप्शन नहीं है। दूकानदार कांग्रेसी हो, भाजपाई हो या किसी और दल का समर्थक हो, दूकान बंद रखता है। यहां तक कि मंत्रियों और विधायकों के व्यापारिक संस्थान भी बंद रहते हैं।

असम में बहुत गरीबी है, दबे-कुचले लोग आतंकवादी बनकर शक्तिशाली महसूस करते हैं, पर साथ में इसमें धन का भी रोल है। आतंकवादी यदि सरेंडर करे तो उसके पुनर्वास के लिए बैंक से कर्जा, ग्रांट आदि की सरकारी सहायता मिलती है, जो अन्यथा नहीं मिलती। बहुत से लोग इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आतंकवादी बनते हैं। आतंकवादी रहते हुए आतंकवादियों को विदेशों से जो पैसा मिलता है, उन्हें उसका हिसाब-किताब देने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार जो लोग आतंकवाद का साथ देते हैं वे दोनों तरह से धनलाभ से आकर्षित होते हैं।

ब्रह्मपुत्र यहां की सबसे बड़ी नदी है। असम में ब्रह्मपुत्र की महत्ता को इसी से समझा जा सकता है कि इसे नदी नहीं नद (यानी, बड़ी नदी) माना जाता है और पुल्लिंग (यानी, पुरुष वाचक) संबोधन दिया जाता है। ब्रह्मपुत्र के आसपास का बहुत का क्षेत्र हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है और बाढ़ खत्म होने पर खाली हुई जमीन स्थाई निवास के काम नहीं आती, लेकिन बांग्लादेश से आये लोगों को आतंकवाद से जुड़े लोग ब्रह्मपुत्र के आसपास बसा देते हैं और उनसे अफीम की खेती करवाते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अफीम की बहुत कीमत है जो आतंकवादियों के लिए आय और हथियार पाने का बहुत बड़ा ज़रिया है। असम में बंाग्लादेश से आने वाले लोगों को इसलिए नहीं रोका जाता क्योंकि वे कांग्रेस के लिए बड़ा वोट बैंक हैं। आतंकवादी और सरकार एक दूसरे के सहयोगी नहीं हैं, पर दोनों एक दूसरे को पूरी तरह से खत्म भी नहीं करना चाहते क्योंकि एक के अस्तित्व में ही दूसरे की कमाई है। इस प्रकार बांग्लादेशी घुसपैठिये, सरकार और आतंकवादियों के इस अव्यक्त गठजोड़ के कारण भारत में आ बसते हैं और यहीं बसे रह जाते हैं।

आतंकवाद से जुड़ा एक और पहलू भी है। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य हो कि असम में राजनीति से जुड़े लोगों में से बहुत से ऐसे हैं जिनकी संपत्ति में पिछले पांच वर्षों में ही 2000 गुणा वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार के अलावा दुनिया का कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जो पांच वर्षों में आपकी संपत्ति में 2000 गुणा बढ़ा सके। एक और बड़ा और महत्वपूर्ण सच यह है कि आतंकवाद की समाप्ति के लिए सहायता के तौर पर राज्य को केंद्र से खरबों रुपये मिलते हैं। मगर यह सहायता राजनीतिज्ञों और अधिकारियों तक सीमित रह जाती है। हाल ही में एक भयावह मामला सामने आया कि केंद्र से सहायता के रूप में मिली धनराशि पात्र लोगों में बांटने के बजाए मंत्रियों व अधिकारियों ने दबा ली। एक स्वयंसेवी संगठन ने जब इसका पर्दाफाश किया तो पता चला कि एक मंत्री ने वह पैसा छुपाने के लिए अपने घर में दोहरी पर्तों वाली दीवारें बनवा कर उनमें छुपा रखा था। दर्जनों अधिकारी बर्खास्त हुए और एक ने तो आत्महत्या तक कर ली। लेकिन उसके बाद आगे कुछ नहीं हुआ। आतंकवाद के जारी रहने का यह सबसे बड़ा कारण है। आतंकवाद के अर्थशास्त्र का यह सबसे घिनौना पहलू है।

अन्ना हज़ारे के आंदोलन से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम शुरू हुई है। सारे शोर-शराबे के बावजूद अभी यह मुहिम शैशवावस्था में है और अभी एक लंबी लड़ाई बाकी है। उससे भी ज्य़ादा जरूरी है भ्रष्टाचार के विभिन्न स्वरूपों को पहचानना और फिर उसके निदान के लिए आवश्यक और प्रभावी उपाय करना। भ्रष्टाचार के कारण कुछ लोग आवश्यकता से अधिक अमीर हो रहे हैं जबकि एक बहुत बड़ी जनसंख्या दो जून की रोज़ी-रोटी की मोहताजी से उबर पाने के लिए छटपटा रही है। गरीब और दबे-कुचले लोग आतंकवाद की शरण में जाने को विवश हो रहे हैं। इस तथ्य से अनजान आम आदमी एक तरफ सरकारी भ्रष्टाचार की मार सह रहा है तो दूसरी ओर आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो रहा है। आतंकवाद से परेशानी सिर्फ आम जनता को है, और आतंकवाद के जारी रहने का एक बड़ा कारण हमारे जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार है। इस सच्चाई को समझे बिना आतंकवाद से नहीं निपटा जा सकता।

यदि हम आतंकवाद से निपटना चाहते हैं तो हमें भ्रष्टाचार से भी साथ ही निपटना होगा। अन्ना हजारे के माध्यम से इस लड़ाई की शुरुआत तो हो चुकी है, पर लड़ाई को जारी रखना होगा। हमें याद रखना चाहिए कि सरकारें कभी क्रांति नहीं लातीं। क्रांति की शुरुआत सदैव जनता की ओर से हुई है। अब जनसामान्य और प्रबुद्धजनों को एकजुट होकर एक शांतिपूर्ण क्रांति की नींव रखने की आवश्यकता है। ई-गवर्नेंस, शिक्षा का प्रसार, अधिकारों के प्रति जागरूकता और भय और लालच पर नियंत्रण से भ्रष्टाचार रूपी रावण को मारा जा सकता है। जनता के हर वर्ग को इसे समझने, दूसरों को समझाने और सबको साथ लेकर इस प्रयास को मजबूती देने का काम करना होगा तभी हम भ्रष्टाचार से लड़ पायेंगे और एक स्वस्थ, समृद्ध और विकसित समाज का निर्माण कर पायेंगे अन्यथा यह दीपक भी बुझ जाएगा और हम अंधेरे को कोसते ही रह जाएंगे।यह अगर आसान नहीं है तो असंभव भी नहीं है।            v

Corruption, Terrorism, Economics of Terrorism, Opium & Terrorism, "Alternative Journalism", Pioneering Alternative Journalism in India,